Sunday, March 29, 2015

दिखा-दिखा कर छिपाते हैं..छिपा-छिपा कर दिखाते हैं

लड़कियों की फितरत होती है कि वो अपनी खूबसूरत काया..अपनी हेयर स्टायल..अपनी ड्रेसेस दिखाना चाहती हैं लेकिन जब लगता है कि कोई उसे घूर रहा है..सामने वाले की आंखों में शैतान लड़की को नजर आता है तो वो उसी ड्रेस को और लंबा खींचने का असफल प्रयास करती है..जो लड़कियां ज्यादा हिम्मत वाली होती हैं और जब उन्हें कोई नोटिस नहीं करता है तो वो जबरन अपने ऊपर नजर डालने के लिए अपनी हेयर स्टायल झटकने या फिर ड्रेस को ऊपर नीचे खींचने की एक्टिंग करती हैं...


दरअसल LIFE का ये फलसफा है कि जब हम अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते हैं और हमारे पास शरीर..और कपड़ों के अलावा कुछ नहीं होता है तो हम उसी के जरिए अपने नंबर बढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए तरह-तरह के जतन करते हैं..कई तो इस हद तक उतर जाती हैं कि ड्रेस की लंबाई और चौड़ाई का ध्यान ही नहीं रहता..या फिर ध्यान रहकर भी अनजान बनने की कोशिश होती है..और जब लगता है कि लोग उसे कुछ ज्यादा ही नोटिस कर रहे हैं..तो उसी ड्रेस को खींच-खींच कर उसकी लंबाई बढ़ाने की जद्दोजहद होती है। जाहिर है कि सरेराह चलते..या फिर दफ्तर में..या फिर पार्टी-समारोह में...दो तरह के लोग होते हैं..एक तो हम जिन्हें जानते हैं और दूसरे वो जिन्हें हम नहीं जानते हैं...जिन्हें जानते हैं..उनका आकलन हम ड्रेस से कम..खूबसूरती से कम..उसके ओहदे..उसकी प्रतिष्ठा...उसकी हैसियत...से करते हैं...जिन्हें हम नहीं जानते हैं..तो उन पर तभी नजर पड़ती है जबकि या तो उनकी काया चमक रही हो..या फिर पहनावा ऐसा हो..जिसे देखने के लिए हमारी आंखें..बार-बार उसकी ओर जाएं..आंखें भी दिल-दिमाग से इशारा पाती हैं..और उसी ओर जाती हैं..जहां दिल करता है...दिमाग अगर इजाजत नहीं भी देता है तो दिल कभी-कभी भारी पड़ जाता है..और नजर बचाकर आंखों को उस ओर ले ही जाता है..भले ही दिमाग के कहने पर जल्दी ही निगाह को हटा लें..

जिस तरह आंखें बार-बार किसी को निहारने लगती हैं उसी तरह उन बालाओं के साथ भी होता है जो आकर्षण का केंद्र बनने के लिए तरह-तरह की अदाएं अपनाती हैं और जब उन्हें लगता है कि सामने वाला जरूरत से ज्यादा उस पर ध्यान दे रहा है तो फिर उसी अदा को बैक करने की कोशिश करती हैं...ये शार्टकट कुछ वक्त के लिए जरूर फायदेमंद रहता है..तात्कालिक रूप से हम इस कोशिश के जरिए कुछ लोगों को प्रभावित कर सकते हैं लेकिन जो प्रभावित हो रहे हैं..उनका मकसद अगर आप समझ लेंगे तो ऐसी कोशिश से तौबा कर लेंगे..उनका मकसद वही होता है जो उन्हें सामने दिख रहा है..इससे ज्यादा कुछ नहीं..क्योंकि उन्हें मालूम है कि आपके भीतर खालीपन है..इसलिए आप बाहर से उसे भरने का प्रयास कर रहे हैं...एक समय होता है..एक उम्र होती है...तब तक हम काया के जरिए अपने को ढो सकते हैं..लेकिन जब काया का पीरियड खत्म हो जाएगा तो हमारे पास कुछ नहीं बचेगा..क्योंकि भीतर से तो हम पहले ही खोखले थे..बाहर भी खोखलापन आएगा तो जीवन में निराशा के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

जब हम दिमाग से खाली होते हैं तो ऐसी कोशिश करते हैं...जब हमारे भीतर खालीपन होता है तो हम उसे शरीर के जरिए भरने की कोशिश करते हैं..जिन महिलाओं ने देश का नाम रौशन किया..उन्हें शरीर को दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती..उनका नाम ही काफी होता है..नाम लेते ही एक रिसपेक्ट हमारे मन में आता है तो कुछ ऐसी भी महिलाएं होती हैं जिनका नाम लेते ही..आप किन शब्दों का उच्चारण करते हैं..ये यहां लिखने की जरूरत नहीं...इसलिए कहते हैं कि कुछ दिखा-दिखा कर छिपाते हैं..कुछ छिपा-छिपा कर दिखाते हैं...यही है जीवन दर्शन..बाकी फिर......
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स्वयंभू से जो टकराएगा..चूर-चूर हो जाएगा

हर यूनिट का जो भी मुखिया है..हैड है..प्रमुख है..बास है..उससे टकराने का मतलब ही है कि आप खुद को नष्ट करने जा रहे हैं...जी हां..या तो आप में उतना माद्दा होना चाहिए कि आप तख्ता पलट कर दें..यानि जो मुखिया है..उसे पद से हटाकर खुद मुखिया बन जाएं..ऐसा करते वक्त आपको याद रखना चाहिए कि आप अगर फेल हो गए तो आप धूल में मिल जाएंगे...आप पार्टी हो या बीजेपी..या कांग्रेस..बसपा हो या सपा..डीएमके हो या एआईडीएमके..या फिर जेडीयू हो या बीजेडी..कोई भी राजनीतिक दल देख लो..कोई भी संस्थान देख लो..जहां आप काम करते हो..ये समय की रीति चली आई है क्योंकि जो प्रमुख हैं..वो अपने हिसाब से अपनी संस्था को चला रहा है..इसे आप गलत कहें या सही..लेकिन जो प्रमुख है..उसके नजरिए से देखें तो अच्छा हो या बुरा..कहानी उससे ही शुरू होती है और उसी से खत्म होती है..ये बात अलग है कि टीम वर्क के बिना कोई काम संभव नहीं..कोई सफलता मुमकिन नहीं..लेकिन टीम भी वही बनाता है..टीम को वो अपने हिसाब से चलाता है..

मोदी को देख लो..या राहुल-सोनिया को..या फिर केजरीवाल को...सबसे उत्तम उदाहरण तो बसपा का है जहां पार्टी में फैसले लेने की क्षमता केवल मायावती रखती हैं..यही हाल केजरीवाल का हो रहा है..बीजेपी में मोदी ही फैसले लेने के लिए सक्षम हैं..और कांग्रेस में राहुल..सोनिया गांधी...हमारे जीवन में यही फलसफा लागू होता है..आपके हमारे घर का जो मुखिया है..चाहे वो दादा जी हों या पिता जी...या आप खुद..जो भी यूनिट का हैड है वो तय करेगा कि घर कैसे चलेगा..रीति-रिवाज कैसे चलेंगे...खर्च कैसे चलेगा..स्टंडर्ड कैसा रहेगा..पढ़ाई-लिखाई कैसे चलेगी...पहनावा कैसा चलेगा...यानि घर से लेकर बाहर तक मुखिया के फैसले की छाप रहेगी..

यही हाल आपके और हमारे दफ्तर का है...जो हमारा बास है..वो डिसाइड करेगा कि आपके दफ्तर का माहौल कैसा रहेगा...वहां काम करने का तरीका कैसा होगा...आपको सुविधाएं कैसी मिलेंगी...पूरा सिस्टम उसी पर निर्भर रहता है..जो विरोध करता है..वो या तो अलग-थलग पड़ जाएगा या फिर उसे छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा। हजारों में एक-दो ऐसे होते हैं जो अपने घर...दफ्तर..पार्टी से अलग विचार लेकर क्रांति की ठानते हैं..और वो अपने मुखिया को चुनौती देते हैं...चुनौती तभी देना चाहिए जब आप अपने मुखिया से ज्यादा खुद को ताकतवर समझते हैं..बल्कि समझने से काम नहीं चलेगा..उस ताकत को पहले तौलना पड़ेगा..और फिर आजमाना पड़ेगा..और उसके बुरे नतीजे के लिए भी तैयार रहना होगा...पाकिस्तान में जनरल मुशर्रफ ने तख्तापलट किया और राष्ट्रपति की कुर्सी संभाली..इसे आप किसी भी रूप में लें लेकिन मैं यहां उनकी ताकत और सफलता की बात कर रहा हूं...इसलिए चुनौती तभी देने की सोचो..जब आप उस लायक हो जाओ..नहीं तो सामने वाले को नुकसान पहुंचाने के बजाए खुद के लिए गडढा खोद लोगे..या शुरू से रीति चली आई है कि जिसके के पास ताकत है वो आपके लोगों को भी तोड़ लेगा...इसलिए जिसकी लाठी होगी उसकी ही भैंस होगी।
LIFE में कभी भी आवेश में आकर..जोश में आकर..बिना सोचे-समझे कदम उठाओगे..तो परेशानी का सामना करोगे..और जो आप मौजूदा वक्त में हो..वो भी खो दोगे। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं कि लोगों ने चुनौती दी...और गुमनामी में खो गए..या फिर मन मसोस कर लौट आए..उमाभारती हों या फिर स्व.माधवराव सिंधिया..नारायण दत्त तिवारी...ऐसे बहुत से लोग हैं जो जीवन भर चुनौती देने की सोचते रहे..लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाए..और खुद को घसीटते रहे।

इसलिए LIFE को बेहतर बनाना है तो पहले अपनी ताकत को विकसित करो..और यदि ताकत पैदा करने की क्षमता नहीं है तो चुपचाप मुखिया को सहन करना सीखो..क्योंकि आप उसके फालोअर हो..और वो जो कर रहा है सही कर रहा है..यही आपकी नियति है...बाकी फिर.......इन्हें भी जरूर पढ़िए....bhootsotroyworld.blogspot.com   whatsappup.blogspot.com

Saturday, March 28, 2015

सपने देखो मगर शेखचिल्ली जैसे नहीं

सपने देखने में कोई बुराई नहीं..अच्छा सोचने में बुराई नहीं..मन है..कहीं तक जा सकता है..आप बैठे-बैठे अमेरिका की सैर कर आएं..व्हाइट हाउस में ओबामा की जगह ले लें...ख्यालों में तो बड़ा अच्छा लगता है लेकिन अपने सपनों से दूसरों को प्रभावित न करें..दूसरों से वायदे न करें..दूसरों को भरोसा न दिलाएं..हमारे राजनेता कुछ ऐसे ही सपने दिखा रहे हैं..आज से नहीं..आजादी के वक्त से ही...न जाने कितने चुनाव लड़े गए..अलग-अलग सपनों को दिखाकर..हर पांच साल जनता जान पाती है कि वो ठगी गई...


बात कर रहा हूं बुलेट ट्रेन की..आज इसलिए इसकी याद आ गई..क्योंकि ट्रेन से सफर कर लौटा हूं..ऐसा सफर..जिसकी कड़वी याद जीवन भर रहेगी। ये वो डाटा है जो स्टोर होने के बाद डिलीट होने वाला नहीं..एक साल बाद अपने घर गया था..जिस रात लौट रहा था..ट्रेन आने के आधा घंटे पहले रेलवे इनक्वायरी से पता किया तो बताया गया कि ट्रेन आधा घंटा लेट है..कोई बात नहीं...स्टेशन पहुंचा तो अलग ही नजारा था..करीब दो घंटे पहले दिल्ली-मुंबई रूट पर ललितपुर-झांसी के बीच एक मालगाड़ी पलट गई थी...मालगाड़ी क्या थी..भारी-भरकम विस्फोट भरी गाड़ी थी..पेट्रोल टैंकर लेकर जा रही थी...मालगाड़ी की दुर्घटना इतनी जबर्दस्त थी कि पटरी बीच से टूट चुकी थी...टेंकरों के पलटने से पेट्रोल बड़ी मात्रा में नीचे फैल चुका था...रात आठ बजे दुर्घटना हुई थी..अब आगे का किस्सा सुनिए...कोई बात नहीं..ट्रेन है तो दुर्घटना भी होगी...लेकिन बुलेट ट्रेन चलाने वाले रेलवे की कार्यप्रणाली देखिए...रात साढ़े आठ बजे मालवा एक्सप्रेस ललितपुर स्टेशन पर पहुंच चुकी थी...यात्री ठसाठस भरे हुए थे..जब काफी देर तक ट्रेन नहीं चली..तो यात्रियों ने स्टेशन की इनक्वायरी पर पता करने की कोशिश की...रेलवे कर्मचारी का जवाब था..मुझे कुछ नहीं मालूम..मेरे पास कोई जानकारी नहीं..कब ट्रेन चलेगी..मेरी ट्रेन जबलपुर-निजामुद्दीन एक्सप्रेस का समय निकल चुका था लेकिन कोई पता नहीं था कि ट्रेन कब आएगी..कब जाएगी..स्टेशन पर सैकड़ों यात्री इधर से उधर हैरान-परेशान..बच्चे-बूढ़े..महिलाएं..लेकिन स्टेशन मास्टर से लेकर पूछताछ सेवा तक कोई कुछ बताने को तैयार नहीं..दरअसल वो भी अपने आला अफसरों के फोन का इंतजार कर रहे थे..आगे के निर्देश के लिए....रात के दस बजे..बारह बजे..दो बजे...कुछ पता नहीं..मालवा एक्सप्रेस जस की तस स्टेशन पर टस से मस नहीं हुई...कई घंटों की इस प्रताड़ना के बीच किसी ने स्टेशन पर नींद ले ली..किसी ने रात का खाना खा लिया...लेकिन जिन्हें एक्जाम देने जाना था..वो हैरान-परेशान...

रात के दो बजे...पता चला कि जो ट्रेन आनी थी..वो बीना से ही दूसरे रूट से रवाना हो गई..कोई एनाउंसमेंट नहीं...कोई डिस्पले नहीं...रात तीन बजे स्टेशन पर छह घंटे से खड़ी मालवा एक्सप्रेस चली..तो ज्यादातर यात्री बिना सोचे-समझे उसी में सवार हो गए...ट्रेन चली तो लेकिन आधा घंटे बाद अंधेरे में जंगल में खड़ी हो गई..एक घंटे का सफर चार घंटे में तय कर झांसी पहुंची..बीच में दुर्घटना का नजारा देखा तो दिल कांप गया...पेट्रोल के टैंकर जस के तस खड़े थे..एक क्रेन लगी हुई थी..कुछ कर्मचारी मौजूद थे..लेकिन एक चिंगारी पूरे इलाके तो तबाह कर सकती थी...कैसी पटरी थी..जो टूट गई..कैसा प्रबंधन है कि 10 घंटे में मालगाड़ी को नहीं हटा पाया..कैसा प्रबंधन है कि पेट्रोल के टैंकर और फैला हुआ पेट्रोल को अलग नहीं किया जा सका...रात भर दिल्ली से मुंबई और मुंबई से दिल्ली के लाखों यात्री या तो किसी स्टेशन या जंगल में  भूखे प्यासे तड़पते रहे..मैने भोगा इसलिए मुझे बुरा लगा...मैं एक सामान्य यात्री था..यदि इस सफर में कोई वीवीआईपी होता..या फिर मध्यप्रदेश के मंत्री होते तो कम से कम दस सांसद रेल मंत्री प्रभु से मिलने चले जाते..लाखों यात्रियों की परेशानी का कोई मोल नहीं...

तो फिर बुलेट ट्रेन का सपना क्यों देख रहे हैं प्रधानमंत्री...ऐसा सपना जो यदि साकार भी हो जाए तो किसी मतलब का नहीं..एक मालगाड़ी बेहतर कैसे चले..एक पैसेंजर ट्रेन कैसे समय पर यात्रियों को एक-दो घंटे के रास्ता तय करा दे..कैसे हम दुर्घटनाओं से निपटने की प्रणाली विकसित कर लें..कैसे हम यात्रियों को सूचना देने की ईमानदारी दिखा दें..कैसे हम प्रबंधन को आपदा मैनेजमेंट सिखा दें..यदि ऐसा कर लें तो सबका साथ हो सबका विकास हो..नहीं तो चलाईए बुलेट ट्रेन...चलाईए मत..सपना ही देखिए...बाकी फिर.....इन्हें भी जरूर पढ़िए....bhootsotroyworld.blogspot.com   whatsappup.blogspot.com